ऑनलाइन शिक्षा बनाम शिक्षा का नैतिक-सामाजिक पक्ष

                                                                         
 
                                                                                                                                      महेश तिवारी
बीते दिनों हमारे समाज से तीन खबरें अखबारी पन्नों की सुर्खियां बनती हैं। ये तीनों सुर्खियां समाज से तालुक रखती। पहली खबर बॉयज लॉकर रूम से जुड़ी है। यह खबर इंटरनेट पर बनें एक ग्रुप से सम्बंधित है। जिसमें दिल्ली के कुछ किशोरों द्वारा अपनी सहपाठी लड़कियों को लेकर अश्लील बातें करने और उनकी आपत्तिजनक तस्वीर साझा करने से जुड़ी है। दूसरी खबर ऑनलाइन एप्प जूम से जुड़ी हुई है। जिसका उपयोग तो आए दिन लगातार बढ़ रहा है, लेकिन यह एप्प यूजर्स की निजी जानकारी को चुराने का भी काम करता है। साथ में इस एप्प में कब क्या शुरू हो जाए। इसका पता नहीं। तभी तो पिछले दिनों सुर्खी बनी कि ऑनलाइन क्लास करते वक्त जूम एप्प पर अश्लील वीडियो अपने-आप शुरू हो गई। अब तीसरी खबर पर गौर करें तो जिस दौर में देश लॉकडाउन में है।

 उस दौर में देश के कर्णधारों का भविष्य गर्त में न जाएं उसके लिए सरकार द्वारा ऑनलाइन शिक्षा पर जोर दिया जा रहा।ऐसे में मौजूदा दौर में तात्कालिक उपाय के रूप में शिक्षा के लिए तकनीक का उपयोग सही लगता है, क्योंकि शारीरिक दूरी बनाएं रखना वक्त की नजाकत है। तो शिक्षा सुचारू रूप से चलती रहे, यह भी उतना ही जरूरी। वैसे भी तकनीक का शिक्षा में प्रयोग नई बात नहीं। ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड से लेकर स्मार्टबोर्ड तक की यात्रा शिक्षा में बदलाव की ही तो कहानी गढ़ती है। शिक्षा को रुचिकर बनाना जरूरी भी है, लेकिन क्या महर्षि अरविंद द्वारा बताएं चहुँमुखी विकास करने में ऑनलाइन शिक्षा सक्षम हो सकती? इसके अलावा जिस देश में गुरु के चरणों में बैठकर व्यवहारिक शिक्षा अर्जित किए जाने का विधान रहा हो, और तो और शिक्षा और दर्शन जहां पर एक ही सिक्के के दो पहलू माने जाते हों। 

वहां ऑनलाइन शिक्षा कहीं देश के भविष्य और संस्कार को नेपथ्य में न ले जाए? यह बात विचार करने योग्य है।वैसे भी आज हमारे शिक्षा तंत्र को देखें तो वह उद्देश्यहीनता, निराशा, भ्रष्टाचार और कर्तव्यविमूढता का शिकार है। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा भी शिक्षा के सकल उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाएगी यह तो तय है। मगर यहाँ एक बात गौर करने वाली यह है कि रहनुमाई तंत्र तो वर्षों से शिक्षा तंत्र को भी निजी हाथों में सौंपने को बेताब दिख रहा है। तभी तो वाजपेयी नीत एनडीए सरकार के समय बिड़ला- अंबानी कमेटी की रिपोर्ट में पहली बार शिक्षा को अरबों- खरबों डॉलर के व्यवसाय के तौर पर पहचाना गया। इतना ही नहीं मोदी सरकार भी शिक्षा को ऑनलाइन करने के नाम पर उसे निजी हाथों में देने को उतावली नजर आती। ऐसे में समझ नहीं आता, जो शिक्षा राष्ट्र निर्माण का साधक होती, उसे क्यों निजी हाथों में सौंपकर देश का भविष्य खराब करने पर सरकारें हर समय तुली रहती है। 

वर्तमान केंद्र सरकार ने तो 2020 के बजट के दौरान ऑनलाइन डिग्री प्रोग्राम चलाने तक की बात कही थी। इतना ही नहीं स्वायत्त संस्था यूजीसी को खत्म करके हायर एजुकेशन फाइनैंसिंग एजेंसी ( हेफा ) को अमलीजामा पहनाया जा रहा। अब सोचिए जब अनुदान आधारित व्यवस्था की जगह कर्ज आधारित व्यवस्था आएगी तो शिक्षा अर्जित करना महंगा तो होगा ही। ऐसे में यह तो संवैधानिक अधिकार का सीधा सा उल्लंघन होगा।चलिए अब बात ऑनलाइन शिक्षा के क्षेत्र में आने वाली कमियों और उसके कारण समाज में आने वाली दुश्वारियों की करते हैं। जिस देश में स्कूली शिक्षा के लिए शिक्षक, भवन आदि जरूरी सुविधाएं न हों, वह अगर बात तकनीक आधारित शिक्षा की करें तो यह बात बचकानी सी लगती है। वैसे परिवर्तन प्रकृति का नियम है। 

लेकिन परिवर्तन ऐसा होना चाहिए, जो बहुमत को प्रभावित करे। ऐसे में जब बात ऑनलाइन शिक्षा की होगी तो इस क्षेत्र में आगे बढ़ने में अनेकोनेक चुनौतियाँ हैं। प्रशिक्षित शिक्षकों का न होना, बिजली आपूर्ति की समस्या, ऑनलाइन शिक्षा के लिए जरूरी उपकरणों का अभाव, इंटरनेट की स्पीड़ बहुत कम होना आदि आदि।चलिए कुछ आंकड़ो पर निगाह दौड़ाते हैं। मिशन अंत्योदय के अंतर्गत 20 फीसदी ग्रामीण परिवारों को 8 घण्टे से कम बिजली मिलती और 47 फीसदी को 12 घण्टे से अधिक। इसके अलावा 2018 के एक अध्ययन के मुताबिक सिर्फ 24 फीसदी लोगों के पास स्मार्टफोन है। इसके अलावा एक रिपोर्ट के मुताबिक जुलाई 2017 से जून 2018 के बीच देश में सिर्फ 10.7 फीसदी परिवारों के पास ही कंप्यूटर था। 

इसके अलावा जिस देश में एक कमरे में पांच पांच लोग रहते हों, वहां बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई के लिए कैसे शांतिपूर्ण वातावरण मिलेगा यह बड़ा सवाल है? इसके अलावा डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट की स्पीड तो देश की माशा अल्लाह है ही! इसके अलावा अगर इंटरनेट प्रकृति को प्रदूषित करने का काम करती, फिर इंटरनेट के माध्यम से ऐसा पढा- लिखा आदमी बनने की क्या जरूरत जो अपने संवैधानिक कर्तव्यों को ताक पर रखने की बात करें। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध भौतिकविद डॉक्टर एलेक्स विजनर- ग्रास की मानें तो गूगल पर दो बार खोज करने पर लगभग उतनी ही कॉर्बन डाइऑक्साइड पैदा होती जितनी कि एक कप चाय बनाने में।

ऐसे में आपको पता होना चाहिए कि एक कप चाय उबालने में 15 ग्राम कॉर्बन डाइऑक्साइडड निकलती। फिर हम क्यों जानें- अनजाने प्रकृति और अपने आप से खेलते रहते हैं, समझ नहीं आता। इसके अलावा अगर बच्चों के हाथ में मान लीजिए 5 से 7 घण्टे के लिए डिजिटल उपकरण थमा दिया गया वह भी नेट के साथ तो क्या भरोसा वे एकांत में पढ़ाई ही करेंगे? और एक व्यक्ति औसतन पांच घण्टे स्क्रीन पर टकटकी लगाकर बैठेगा तो उनकी मानसिक और शारीरिक स्थिति क्या होगी? इसका तो सहज अंदाजा लगाया जा सकता। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा के राह में रोड़े कई है। हाँ एक खास बात सभ्य समाज और संवैधानिक व्यवस्था में जहां अमीर- गरीब सभी तबके के लोग और आर्थिक असमानता चरम पर है। वहां के लिए ऑनलाइन शिक्षा समस्याओ की जड़ से ज्यादा कुछ नहीं।

ऐसे में देश को लॉकडाउन के समय में रेडियो, टीवी पर शिक्षा देने का विचार करना चाहिए था। इसके अलावा आने वाले समय में भी ऐसी व्यवस्था हो, जहां गुरुकुल जैसी कोई व्यवस्था चलाई जाए। वहीं देश के भविष्य के लिए बेहतर हो सकती। वरना देश की शिक्षा व्यवस्था तो गर्त में जाएगी ही, देश भी रसातल की तरफ बढ़ जाएगा।। यह निश्चित मानिए, क्योंकि तकनीक हमें सुविधाएं दे सकती है, लेकिन फीलिंग्स नहीं। हम लोगों से भावनाओ से जुड़ने वाले देश के वासी हैं। जहां कक्षा में बैठे छात्र के चेहरे का भाव पढ़कर शिक्षक उसकी समस्याएं समझ लेता है। यह व्यवस्था तकनीक हमें तो नहीं दे सकती न? फिर तकनीक के पीछे इतना मोह क्यों?

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