लिपुलेख और कालापानी विवाद


                                                                                                                                       एन.के. सोमानी
भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने बीते शुक्रवार को उतराखंड के पिथौरागढ़ जिले के धारचूला से लिपुलेख को जोड़ने वाली सड़क का वीडियो कांफ्रेस के जरिए उद्घाटन किया था। चीन की सीमा से सटा हुआ 17,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित लिपूलेख दर्रा इस सड़क के माध्यम से अब उत्तराखंड के धारचूला से जुड़ गया है।भारत के बार्डर रोड आगेर्नाजेशन ने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित लिपुलेख दर्रे को मानसरोवर यात्रा मार्ग से जोड़कर रणनीतिक मोर्चे पर बड़ी कामयाबी हासिल की है। 80 किलोमीटर लंबे इस सड़क मार्ग के बन जाने के बाद जहां एक ओर अब तीर्थयात्रियों को कैलाश मानसरोवर जाने के लिए केवल सात दिन का समय लगेगा वहीं दूसरी ओर इस मार्ग के चालू हो जाने के बाद भारत की थल सेना के लिए रसद और युद्ध सामग्री चीन की सीमा तक पहुंचाना आसान हो जाएगा। कुल मिलाकर कहा जाए तो इस सड़क को आंरम्भ कर भारत ने एक तरह से चीन के द्वार पर दस्तक दे दी है। साल 2018 में चीनी सेना ने पिथौरागढ के बाराहोती में घुसपैठ की कोशिश की थी लेकिन, अब इस मार्ग के शुरू हो जाने के बाद चीनी मनसूबों पर नियंत्रण लगाया जा सकेगा।

दूसरी ओर भारत के अहम पड़ोसी नेपाल ने भारत के इस कदम का कड़ा विरोध किया है। लॉकडाउन के बावजूद बड़ी संख्या में नेपाली नागरिकों ने भारतीय दूतावास के सामने इक्कठा होकर प्रदर्शन किया। नेपाल सरकार भी भारत के इस कदम का विरोध कर रही है, उसका कहना है कि लिपुलेख दर्रा नेपाल का हिस्सा है, इस लिए भारत को यहां कोई गतिविधि नहीं करनी चाहिए, मानसरोवर लिंक रोड़ का निर्माण कर भारत ने एक तरफा कार्रवाई की है। इससे पहले नेपाल कालापानी क्षेत्र पर भारत के दावे का विरोध कर रहा है। भारत ने पिछले दिनों कालापानी क्षेत्र को भारत के नक्शे में दिखाना शुरू किया तो नेपाल ने भारत को दो टूक कहा कि यह नेपाल का हिस्सा है, भारत को तत्काल यहां से अपनी सेना हटा लेनी चाहिए, नेपाल भारत को अपनी एक भी इंच जमीन नहीं देगा।

साल 2018 में केपी ओली के नेतृत्व में नेपाल में जब कम्युनिस्ट सरकार का गठन हुआ तभी से इस बात की आशंका प्रकट की जाने लगी थी कि आने वाले दिनों में भारत-नेपाल संबंधों की स्थिति कोई बहुत ज्यादा बेहतर रहने वाली नहीं होगी। कालापानी और अब लिपुलेख दर्रे पर नेपाल की आपत्ति ने उक्त आशंकाओं को सही साबित कर दिया है। लिपुलेख मामले में नेपाल सुगौली संधि ( सन1816 ) का हवाला दे रहा है। उसका कहना है कि वह इस संधि का पूरी तरह से अनुपालन कर रहा है। पूर्व में काली (महाकाली) नदी से इधर के सभी भूभाग लिंपियाधूरा, कालापानी और लिपुलेख नेपाल के भूभाग हैं। कालापानी काली नदी का उद्गम स्थल है। 35 वर्ग किलोमीटर का यह इलाका भी उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में आता है। 

यहां भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के जवान तैनात रहते हैं। यहां भारत, नेपाल और चीन की सीमाएं मिलकर एक त्रिकोण का निर्माण करती है। नेपाल का आरोप है कि भारत और चीन के बीच 1962 के युद्ध के दौरान भारत ने अपनी उत्तरी सीमा से आगे बढकर उसके कई इलाकों का इस्तेमाल किया था।लेकिन, यु़द्ध के बाद भारत ने अन्य जगहों से तो अपनी सैन्य चैकियां हटा लीं लेकिन कालापानी से सेना नहीं हटाई। नंवबर 2019 में भारत-नेपाल के बीच विवाद उस वक्त उठ खड़ा हुआ जब भारत ने 2 नंवबर को देश का नया नक्शा जारी किया। इसमें पाक प्रशासित कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान और कालापानी इलाके को भारतीय सीमाओं के अंदर दिखाया गया। नक्शे के जारी होने के बाद पहले पाकिस्तान और फिर नेपाल ने आपत्ति की। हालांकि अब इस सीमा विवाद का हल खोजने की जिम्मेदारी दोनों देशों के विदेश सचिवों को दी गई हैं। 

1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से भारत ने यहां अपने सैनिक तैनात कर रखे है। लेकिन, इससे पहले नेपाल ने कभी इस पर विवाद खड़ा नहीं किया। अब नेपाल कह रहा है कि भारत की एक तरफा कार्रवाई दोनों देशों के बीच सीमा मुद्दों के समाधान के लिए बनी आपसी समझ के खिलाफ है।लिपुलेख और कालापानी विवाद के बीच महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इस तरह के विवाद दोनों देशों के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाले रिश्तों पर क्या असर डालेगें। वैसे भी प्रधानमंत्री केपी ओली के सत्ता में आने के बाद नेपाल पर चीन का प्रभाव लगातार बढ़ा है। ऐसे में ताजा विवाद कहीं न कहीं नेपाल में भारत के हितों को प्रभावित कर सकता है। नेपाल किस कदर चीन के प्रभावक्षेत्र में है, 

इसको एवरेस्ट पर चीन के 5 जी नेटवर्क परियोजना शुरू करने के उदाहरण से समझा जा सकता है। भारत के साथ लिपुलेख विवाद के अगले ही दिन चीन की सरकारी मीडिया ने माउंट एवरेस्ट की कुछ तस्वीरें जारी कर उसे अपना हिस्सा बताया । जबकि चीन और नेपाल के बीच 1960 में सीमा विवाद के समाधान के लिए हुए समझौते के बाद माउंट एवरेस्ट को दो भागों में बांट दिया गया था। इसका दक्षिणी हिस्सा नेपाल के पास और उत्तरी हिस्सा तिब्बत स्वायत क्षेत्र में आ गया । चूंकि तिब्बत पर चीन का कब्जा है, इस लिए उत्तरी हिस्से को चीन अपना बताता है ।

हालांकि चीन की इस हरकत पर नेपाल में विरोध शुरू हो गया है, और लोग सरकार से चीन को सबक सिखाने की मांग कर रहे हैं। लेकिन लिपुलेख मामले में भारत को नसीहत देने वाली नेपाल सरकार एवरेस्ट के मसले पर चुप्पी साधे हुए है। ओली सरकार ने चीन के इस दुस्साहस पर पंक्तियां लिखे जाने तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। ऐसे में नेपाल और उसके मुखिया के पी ओली की मनरूस्थिति को समझा जा सकता है। मानसरोवर के रास्ते चीन की सीमा तक भारत की सीधी पहुंच रणनीतिक दृष्टि से तो बड़ी कामयाबी कहा जा सकता है, लेकिन नेपाल में भी भारत को अपने हित नजर अंदाज नहीं करने चाहिए। इस लिए कहीं बेहतर होगा कि चीन को साधने के लिए भारत नेपाल को साथ लेकर चलने की नीति का अनुसरण करे।

टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां