सौहार्द कायम करना सबकी जिम्मेदारी


                                                                                                                                      सुधांशु रंजन
दिल्ली दंगे को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कहा है कि इसमें किसी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा, भले ही उसकी जाति या धर्म कुछ भी क्यों न हो। एक पंथनिरपेक्ष राष्ट्र में मजहब के नाम पर कोई भेदभाव नहीं हो सकता। आशा है, दोषियों की पहचान कर उन्हें कठोर दंड दिया जाएगा। दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों के लिए घृणा फैलाने वाले भाषणों को जिम्मेदार माना जा रहा है। अमित शाह ने सोनिया गांधी को जिम्मेदार ठहराया कि उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून के विरुद्ध आर-पार की लड़ाई का आह्वान करते हुए भड़काऊ भाषण दिया। विपक्ष ने अनुराग ठाकुर तथा अन्य बीजेपी नेताओं के बयान को हिंसा के लिए जिम्मेदार माना।

भड़काऊ बयान सभी समुदायों की ओर से आए- ‘गोली मारो सालों को’ से लेकर ‘100 करोड़ पर 15 करोड़ भारी’ तक। इसके अलावा कई अन्य छिटपुट बयान हैं। शरजील इमाम का असम को काटने वाला बयान सीधा-सीधा देशद्रोह की श्रेणी में आएगा। हेट स्पीच (घृणा फैलाने वाला भाषण) को भारतीय दंड विधान में एक संज्ञेय अपराध मानते हुए धारा 295-क के रूप में 1928 में जोड़ा गया। किसी की धार्मिक भावना को आहत करना हेट स्पीच की श्रेणी में आता है, भले ही उससे हिंसा हुई हो या नहीं। दिल्ली में भयंकर दंगे हुए। इसलिए मामला केवल घृणा फैलाने वाले भाषण का नहीं है। हेट स्पीच तथा भड़काऊ भाषण में फर्क है। भारतीय दंड विधान की धारा 153-क के तहत ‘धर्म, मूलवंश, भाषा, जन्म-स्थान, निवास-स्थान इत्यादि के आधारों पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन और सौहार्द बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले कार्य करना’ अपराध है। फिर धारा 295-क को जोड़ने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसके लिए 1920 के दशक में जाना होगा जब दो बड़ी घटनाओं ने सांप्रदायिक सौहार्द को बुरी तरह बिगाड़ा था।

4 अप्रैल 1919 को आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानंद ने जामा मस्जिद से हिंदू-मुस्लिम और राष्ट्रीय एकता पर बड़ी जनसभा को संबोधित किया। उस समय माहौल इतना बिगड़ गया था कि हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए गांधीजी ने 1924 में 18 सितंबर से 8 अक्टूबर तक 21 दिनों का अनशन किया था। जब गांधीजी उपवास पर थे तो मोहम्मद अली ने एक सर्वधर्म सम्मेलन कराया। उसमें निश्चय किया गया कि कोई भी किसी दूसरे धर्म की भावना को ठेस नहीं पहुंचाएगा और यदि कोई ऐसा करता है तो इसका बदला लेने का किसी को हक नहीं है। खुद बदला लेना न केवल गैर-कानूनी है, बल्कि धर्म विरुद्ध भी है। लेकिन ये प्रयास सांप्रदायिकता की आग बुझाने में नाकाम रहे। स्वामी श्रद्धानंद ने भले ही लाल किले से मुसलमानों को संबोधित किया हो, किंतु बाद में मुस्लिम समुदाय उनसे नाराज हो गया क्योंकि वह शुद्धि आंदोलन चलाते थे, जिसके तहत पूर्व में धर्म परिवर्तन कर हिंदू से मुसलमान बनने वालों को वापस हिंदू बनाया जाता था।

23 दिसंबर 1926 को अब्दुल रशीद नामक एक युवक ने स्वामी श्रद्धानंद की हत्या कर दी। इसके दो दिन बाद गुवाहाटी कांग्रेस में महात्मा गांधी ने एक श्रद्धांजलि प्रस्ताव पेश किया जिसमें लोगों से अपील की कि नफरत और दुष्प्रचार का माहौल खत्म करने में मदद करें। उन्होंने माहौल बिगाड़ने के लिए अखबारों को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि यदि 90 फीसदी अखबार बंद हो जाएं तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उन्होंने हत्यारे अब्दुल रशीद को भाई कहा और उसे दोषमुक्त कर दिया। बाद में मौलाना मोÛहम्मद अली अब्दुल रशीद की पैरवी में स्वयं आगे आ गए। इससे देश का माहौल और बिगड़ गया। 1927 में एक पुस्तक ‘रंगीला रसूल’ का प्रकाशन हुआ जिसमें पैगंबर मोहम्मद के बारे में कथित तौर पर कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां थीं। यह पुस्तक मुसलमानों द्वारा प्रकाशित एक पुस्तिका की प्रतिक्रिया के रूप में लिखी गई थी जिसमें देवी सीता का आपत्तिजनक चित्रण था।

‘रंगीला रसूल’ के लेखक थे आर्य समाजी पंडित एम ए चामुपति, किंतु प्रकाशक महाशय राजपाल ने उनका नाम नहीं दिया था। कुछ मुसलमानों की शिकायत पर प्रकाशक राजपाल को गिरफ्तार कर उनपर मुकदमा चलाया गया परंतु अदालत ने उन्हें रिहा कर दिया। इस केस में भारतीय दंड विधान की धारा 153-क लागू नहीं होती थी क्योंकि दोनों समुदायों के बीच कोई तनाव नहीं हुआ और धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना उस समय कोई अपराध नहीं था। तभी इल्मुद्दीन नामक युवक ने अदालत के अंदर ही महाशय राजपाल की छुरा मारकर हत्या कर दी। इल्मुद्दीन को फांसी की सजा हुई। मुस्लिम समुदाय के दबाव पर भारतीय दंड विधान में धारा 295-क जोड़ी गई जिसमें धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना अपराध माना गया।

धारा 153-क तथा 295-क में फर्क करने की जरूरत है। जिस भड़काऊ भाषण या बयान के कारण दंगा हो जाए वह धारा 153-क के अंतर्गत दंडनीय होगा। मगर धारा 295-क बिलकुल भिन्न है और आज इस धारा का सबसे ज्यादा दुरुपयोग हो रहा है। कोई भी व्यक्ति किसी के खिलाफ उसके किसी वक्तव्य का हवाला देकर देश के किसी हिस्से में मुकदमा दायर कर देता है कि उसकी धार्मिक भावना आहत हुई है। यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है। हर व्यक्ति को दूसरे की धार्मिक भावना का सम्मान करना चाहिए, किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि धर्म के नाम पर चलाई जाने वाली कुरीतियों या होने वाले शोषण की आलोचना नहीं होनी चाहिए। अगर ऐसा चलन चल पड़ा तो समाज में कोई सुधार ही नहीं होगा।

देश नाजुक घड़ी से गुजर रहा है। ऐसे में सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। दोषियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए और दोनों समुदायों के वरिष्ठ नेताओं को इस दिशा में प्रयास करना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के सदर मौलाना अरशद मदनी के बीच इस बारे में कुछ महीने पहले बातचीत भी हुई थी कि हिंदू-मुस्लिम एकता को कैसे मजबूत किया जाए। इस बारे में ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

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