गन्ना किसानों के जीवन में कब घुलेगी मिठास


When will sugarcane dissolve in the life of sugarcane farmers
                                                                                                                                       के. सी. त्यागी
सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद गन्ना किसानों की हालत में सुधार नहीं हो पा रहा है। विडंबना यह है कि अच्छी फसल का लाभ भी गन्ना किसानों को नहीं मिल पाता। मूल समस्या है बकाये के भुगतान की। चीनी मिलों पर गन्ना उत्पादकों का 2400 करोड़ रुपये अभी तक बकाया है। यह राशि पिछले दो गन्ना फसल वर्षों अक्टूबर-सितंबर के दौरान की है। पिछले महीने तक चीनी मिलों द्वारा वर्ष 2018-19 के चीनी सत्र का 84,700 करोड़ रुपये और 2017-18 का 84,900 करोड़ रुपये चुकाया जा चुका है। फरवरी 2020 तक मिलों को वर्ष 2018-19 के लिए किसानों को 87,000 करोड़ रुपये तथा वर्ष 2017-18 के लिए 85,000 करोड़ रुपये की बकाया राशि का भुगतान करना था लेकिन अब भी वर्ष 2018-19 के चीनी सत्र का 2300 करोड़ और 2017-18 का 100 करोड़ चीनी मिलों पर बकाया है।

आदेशों की अनदेखी

पिछले लगातार दो चीनी सत्रों में अधिशेष चीनी उत्पादन की वजह से चीनी की कीमतों में गिरावट का रुख रहा, जिससे मिलों की नकदी की स्थिति प्रभावित रही। लेकिन यह पहला अवसर नहीं है जब गन्ना किसानों को अपने उत्पादों के दामों के लिए मिलों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। यह हर साल की समस्या बन चुकी है। बंपर उत्पादन की स्थिति में उत्पादों के दाम के भुगतान में लेटलतीफी गन्ना उत्पादकों के लिए प्रतिवर्ष का ‘सिरदर्द’ बनी हुई है। प्रत्येक वर्ष पेराई मौसम का आधा से अधिक समय बीत जाने तक किसानों की 50 फीसदी से अधिक तक की राशि बकाया रह जाती है जिससे उनके परिवार का जीवनयापन व अन्य आवश्यक कार्य सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं। खासकर नकदी फसलों के उत्पादक कृषि ऋण में दबे होते हैं, लिहाजा उन्हें समय पर कर्ज लौटाने की भी चिंता होती है। एक तरफ किसानों को उत्पादों के दाम समय पर नहीं मिल पाते, दूसरी तरफ बैंकों द्वारा कर्ज चुकाने वाली रिकवरी नोटिसें उनकी आर्थिक-मानसिक परेशानियां बढ़ाने का काम करती हैं।

लगभग प्रत्येक वर्ष की यह समस्या ‘शुगरकेन ऑर्डर’ को धता बताती रही है। सेंट्रल शुगरकेन ऑर्डर के अनुसार मिलों द्वारा किसानों को खरीद के 14 दिनों के अंदर कीमत भुगतान करने का आदेश है। ऐसा नहीं होने पर 15 फीसदी वार्षिक दर से ब्याज देने का प्रावधान भी है। लेकिन ऐसे आदेश कागजों तक सीमित रहे हैं। वर्ष 2019-20 के पेराई मौसम की बात करें तो उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 7,392 करोड़ रु किसानों का मिलों पर बकाया है। इसी तरह वर्ष 2018-19 का 515 करोड़, वर्ष 2017-18 का 40 करोड़ और 2016-17 का 22 करोड़ चीनी मिलों पर अभी तक बकाया है। लगभग ऐसी ही स्थिति अन्य गन्ना उत्पादक राज्यों की भी है। एक रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र में चालू वर्ष के लिए 15 दिसंबर 2019 तक मिलों द्वारा किसानों से 535 करोड़ रुपये के गन्ने की खरीद की गई, जिसके एवज में किसानों को केवल 111 करोड़ का ही भुगतान किया गया। शेष 415 करोड़ की राशि बकाया श्रेणी में लंबित है।

मिलों द्वारा किसानों को कीमत भुगतान करने में इतनी देरी तब बरती जा रही है जब सरकार मिलों को घाटे से उबारने तथा किसानों की बकाया राशि भुगतान करवाने के उद्देश्य से उन्हें हजारों करोड़ की वित्तीय मदद करती रही है। इसके बावजूद किसानों का मिलों पर बकाया घटने की बजाय लगातार बढ़ता रहा है। गन्ना किसानों की दूसरी बड़ी समस्या यह है कि गन्ने का एफआरपी, जो कि मिलों द्वारा किसानों को दिया जाने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य होता है, प्रतिवर्ष बढ़ती महंगाई के अनुरूप नहीं बढ़ाया जाता है। वर्ष 2019-20 के लिए गन्ने का एफआरपी 275 रु प्रति क्विंटल तय किया गया है। 2018-19 में भी एफआरपी 275 ही था। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र आदि राज्यों में केंद्र द्वारा निर्धारित एफआरपी पर ही गन्ने की कीमत का भुगतान होता है जबकि उत्तर प्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु आदि राज्यों में राज्य समर्थित मूल्य पर भुगतान की व्यवस्था है।

अन्य फसलों की तरह ही गन्ने का एफआरपी निर्धारित करने की व्यवस्था अब तक किसानों के लिए लाभकारी नहीं रही है। लागत मूल्य निर्धारण प्रक्रिया आज भी सवालों के घेरे में है। सरकारी तंत्र द्वारा यह तथ्य स्वीकार किया जा चुका है कि निर्धारित एमएसपी भी किसानों को नहीं मिल पा रहा है। सरकार की अधिकतर नीतियां किसानों के बजाय मिल मालिकों को ही लाभ पहुंचाती हैं। जैसे, चीनी के आयात शुल्क को 40 फीसदी से बढ़ाकर 50 फीसदी किया जाना चीनी मिलों के ही हित में रहा। इन सब के पीछे उद्देश्य यह था कि गन्ना उत्पादकों के बकाये की भुगतान क्षमता प्रभावित न हो और उन्हें समय पर भुगतान की राशि मिल सके। लेकिन अफसोस कि इतने सरकारी प्रयासों के बावजूद किसान अपने उत्पादों की कीमत के लिए मिलों के चक्कर काटते परेशान हो रहे हैं।

निवेश में वृद्धि

विभिन्न अध्ययनों से स्पष्ट हो चुका है कि बीमा योजना समेत अन्य किसान कल्याण योजनाएं धरातल पर कारगर नहीं रही हैं। ऐसी तमाम समस्याओं के कारण खेती-बारी घाटे का सौदा बनी हुई है। किसानों की आत्महत्या पर काबू नहीं पाया जा सका है। गांवों से पलायन नहीं रुक पा रहा है। जीडीपी में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की भागीदारी दिन पर दिन कम से कमतर होती जा रही है। ऐसे में जरूरत है कि किसान संगठनों की मांगों के अनुसार सी2 आधारित लाभकारी एफआरपी तथा एमएसपी निर्धारित कर सख्त निर्देशन में फसलों की कीमतों का भुगतान समय पर सुनिश्चित किया जाए। अन्य सभी उद्योगों की तरह कृषि को भी घाटे से उबारने के लिए सख्त कानून और किसानोन्मुखी नीतियां बनें और उनका ढंग से क्रियान्वयन हो। इनके साथ-साथ इस क्षेत्र में निवेश की भी आवश्यकता है। ऐसी पहलकदमियों से ही किसानों की आमदनी दोगुनी होगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी सुधार आएगा।

                                                                                                        (लेखक जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं)

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