दिल्ली के न्यूज चैनल्स दिल्लीवासियों की सोच से कोसों दूर


                                                                                                                                 हरीश चंद्र बर्णवाल
याद कीजिए जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और दिल्ली के न्यूज चैनल्स उनके खिलाफ एकतरफा रिपोर्ट दिखाते थे। गुजरात में हर चुनाव के बाद देश के हर राज्य के लोगों की यही राय होती थी कि आखिर इतना खराब शासन (जैसा कि अधिकतर न्यूज चैनल पक्षपातपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करते थे) होने के बाद भी नरेंद्र मोदी गुजरात का चुनाव प्रचंड बहुमत से कैसे जीत जाते हैं। एक मीडियाकर्मी होने के नाते मैं देख रहा हूं कि आज भी राजधानी दिल्ली का वही हाल है। आज भी दिल्ली के न्यूज चैनल्स और यहां के लोग अलग-अलग टाइम जोन में जी रहे हैं। अगर मैं ये कहूं कि दोनों की सोच के बीच बहुत फासला है तो गलत नहीं होगा। इसकी कई वजहें हैंः

अधिकतर न्यूज चैनल्स पर आरोप है कि वे पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग कर रहे हैं। चैनल अपने हिसाब से उन खबरों को तरजीह दे रहे हैं, जो उनकी एडिटोरियल टीम को सूट करता है।

कई चैनलों ने जिस प्रकार एक पक्ष को विलेन की तरह पेश करना शुरू कर दिया है, वो एक प्रकार से दिल्ली के लोगों में नफरत के बीज बोने का काम कर रहा है। सच्चाई ये है कि दोनों पक्षों के लोगों को भारी नुकसान हुआ है, दोनों समुदायों के लोग मारे गए हैं।

सिर्फ एक कपिल मिश्रा का नाम ले-लेकर जिस प्रकार चैनल उन्हें विलेन बता रहे हैं, उससे दिल्ली का वास्तविक दर्द उजागर नहीं हो पा रहा है। आपने एक टेलीविजन न्यूज चैनल में एक बहुत बड़े नामी पत्रकार की रिपोर्टिंग के दौरान देखा होगा, जब वे लोगों से पूछते हैं कि क्या कपिल मिश्रा जिम्मेदार हैं, तो अधिकांश लोग एक झटके में बताते हैं कि उनका कोई कसूर नहीं है।

दंगा से ग्रस्त आज दिल्ली के लोगों का मूड क्या है, ये आपको कुछ तस्वीरों से ही पता चल जाएगा। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल शपथ लेने के बाद पहली बार दो सार्वजनिक जगहों पर पहुंचे और दोनों जगह उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। नौबत यहां तक आ गई कि उन्हें भागकर उस जगह से निकलना पड़ा।

आज दिल्ली की एक बड़ी सच्चाई ये है कि आम आदमी पार्टी ने एक बार फिर प्रचंड जीत हासिल की, 70 में से 62 विधायक चुनाव जीते। लेकिन इसके बाद भी कोई भी विधायक शायद ही दंगाग्रस्त इलाकों में घूम सकता हो। उन्हें डर है कि लोगों का भारी विरोध झेलना पड़ेगा।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को सिर्फ 8 सीटों पर जीत मिली। लेकिन इन विधायकों के अलावा हारे हुए उम्मीदवार भी अपने-अपने इलाकों में घूम रहे हैं। कई विधायकों की तस्वीरें भी कभी-कभी टीवी पर दिखाई देंगी। इसका मतलब ये है कि लोगों में भाजपा विधायकों के प्रति गुस्सा नहीं है।

सबसे बड़ी केस स्टडी आम आदमी पार्टी के एक कट्टर समर्थक रहे कमल शर्मा की है। कमल ने विधानसभा चुनाव में एक कार्यकर्ता की तरह केजरीवाल और उनकी पार्टी का पुरजोर समर्थन किया, लेकिन जब उनके रेस्टोरेंट को भी दंगाइयों ने जला दिया तो भाजपा विधायक और पार्षद ही उनके काम आया। ये चीजें मीडिया में एकाध चैनलों ने ही दिखाई हैं।

इस समय दंगों के बाद केजरीवाल सरकार से दोनों पक्ष नाखुश दिखाई देते हैं। एक तरफ जहां उनके पार्षद ताहिर हुसैन को लेकर लोगों की भयानक नाराजगी है, वहीं दूसरी ओर जामिया यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों ने भी उनके घर का घेराव किया। विद्यार्थियों को हटाने के लिए पुलिस को वाटर कैनन तक का इस्तेमाल करना पड़ा।

न्यूज चैनल भले ही दंगों को दिखाकर अपनी टीआरपी बटोर रहे हों, लेकिन जिस कारण से स्थिति यहां तक आ पहुंची है, अब तक उसे अधिकतर चैनल सही तरीके से नहीं बता पाए हैं। दिल्ली एनसीआर के लाखों लोग आज शाहीन बाग की वजह से हर दिन परेशान हो रहे हैं। इस बात को शायद न्यूज चैनल भूल रहे हैं।

एक मीडियाकर्मी होने के नाते मुझे पता है कि आज न्यूज चैनलों की विश्वसनीयता पर गंभीर संकट आकर खड़े हो गए हैं। लेकिन इतना कुछ होने के बाद भी सच्चाई ये है कि जो दिल्ली के लोगों के मन में है, वो न्यूज चैनलों से गायब है। जिस बात से दिल्ली के लोगों का गुस्सा धधक रहा है, वो कारण न्यूज चैनल दिखा नहीं रहे। एक पल के लिए मान भी लिया जाए कि कपिल मिश्रा के बयान से लोगों का गुस्सा भड़का है तो फिर उन लोगों के बयान क्यों चुपचाप गायब कर दिए गए, जो लोगों को उकसाने वाले थे। उदाहरण के तौर पर मैं कुछ लोगों के बयान यहां रख रहा हूं। इनमें गांधी परिवार तक शामिल हैः

सोनिया गांधीः हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम अपने घरों से बाहर निकलें और आंदोलन करें..

राहुल गांधीः आपके साथ कांग्रेस पार्टी खड़ी है, मिलकर हिंदुस्तान के लिए हमें लड़ना है..

प्रियंका गांधीः आज अगर हम अपनी आवाज नहीं उठाएंगे, अगर हम इन परिस्थितियों को देखते हुए भी हम चुप रहेंगे तो हमारे देखते-देखते बाबा साहेब का लिखा क्रांतिकारी संविधान नष्ट हो जाएगा..

वारिस पठानः समझ लो हम लोग साथ में आ गए तो क्या होगा। 15 करोड़ हैं, लेकिन 100 करोड़ पर भारी हैं याद रखना।

शरजील इमामः पांच लाख लोग हमारे पास हों ऑर्गेनाइज्ड, तो हम हिंदुस्तान और नॉर्थ-ईस्ट को परमानेंटली कट कर सकते हैं। असम को काटना हमारी जिम्मेदारी है।

एजाज खानः वो टकले से मैं ये कह दूं कि अंजाम उसके हाथ है, आगाज करके देख और भीगे हुए परों से भी परवाज करके देख। ये तो अभी हमारी शेरनियां हैं, जो बैठी हैं और कभी इनके हाथ का तूने करारा खा लिया ना तो वाकई में संन्यासी बन जाएगा तू..

जावेद जाफरीः लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में, यहां पे सिर्फ हमारा घर थोड़ी है।

स्वरा भास्करः वो निहत्थे मुसलमानों पर वार करते हैं, उनकी प्रॉपर्टीज तबाह करते हैं और गालियां देते हैं, घरों में घुसते हैं।
सुशांत सिंहः आत्मा से आवाज आई कि इन्हें छोड़कर कैसे चले जाएं। यहीं लड़ेंगे, मरना पड़ेगा तो मरेंगे भी।

जीशान अयूबः कुछ लोगों ने आवाज उठाने की कोशिश करी थी, उन पर हमला हुआ। बात ये है कि आदमी सेफ है नहीं। आई थिंक, तब तक सब लोग लड़ाई जारी रखेंगे और ये करवाना जरूरी है।

अनुराग कश्यपः ये बहुत लंबी लड़ाई है, ये लड़ाई छोटी नहीं है। कल खत्म नहीं होगी, परसों खत्म नहीं होगी, ये अगले चुनाव के साथ खत्म नहीं होगी।

जावेद अख्तरः ये चाहते हैं कि उसके पास वोट की ताकत नहीं रहे, कहां निकालोगे। पाकिस्तान पांच मुसलमान नहीं लेगा इंडिया से, अफगानिस्तान नहीं लेगा। ये लोग कहां जाएंगे, जिन्हें कहोगे तुम कि हिन्दुस्तान के नहीं हैं। ये यहीं रहेंगे, यहीं नौकरी करेंगे, यहीं काम करेंगे, कितने डिटेंशन सेंटर बना लोगे।

अब जरा खुद सोचिए कि क्या ये बयान भड़काने वाले नहीं थे। और आप ये जानकर आश्चर्य से भर जाएंगे कि दैनिक जीवन की परेशानियों से भरे दिल्ली के लोग इन बयानों से भी भारी गुस्से में हैं। उन्हें इस बात का गुस्सा है कि जो लोग इस प्रकार के आंदोलन का सपोर्ट कर रहे हैं, वो दिन-प्रतिदिन दिल्ली वालों के लिए एक नई मुसीबत लेकर आ रहे हैं। इस बात की झलक न्यूज चैनलों में नहीं दिखाई पड़ती है।

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