अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की हर क्षेत्र में गिरावट क्यों..?

Why does every region of India fall at the international level ..?

                             
                                                                                                                                ओमप्रकाश मेहता
आज-कल देश-विदेश के मीडिया में प्रतिदिन भारत सुर्खियों में नजर आता है, भारत की इन सुर्खियों के पीछे उसका कोई शौर्य या विशेष उपलब्धि नहीं बल्कि उसकी अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में प्रतिदिन किसी न किसी क्षेत्र में गिरावट है। कभी यह अपनी अर्थव्यवस्था की दौड़ में पिछड़ा नजर आता है तो कभी युवकों को रोजगार मुहैय्या कराने में और अब तो यह विश्व की प्रजातांत्रिक सूची में दस स्थान नीचे आ गया, भारत का सर्वोच्च स्कोर 2014 में 7.92 तक पहुंचा, तब भाजपा ने पूर्ण बहुमत की पहली बार सरकार बनाई थी और अब भारत पिछले तेरह सालों में सबसे निचले स्तर पर अर्थात् 51वीं पायदान पर आ गया, 2019 में भारत का डेमोक्रेसी स्कोर 6.9 रहा, जो पिछले तेरह सालों में सबसे नीचे के स्तर का है। अमेरिका के प्रमुख पत्र ‘द ईकनाॅमिस्ट’ ने विश्व के 165 देशों की डेमोक्रेसी सूची जारी की, जिसमें भारत का स्थान 51वां बताया गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाने और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लागू करने की वजह से भारत के प्रजातांत्रिक स्कोर में गिरावट आई। ‘द ईकनाॅमिस्ट’ ने 2006 में डेमोक्रेटिक इण्डेक्स जारी करना शुरू किया था, तब से अब तक 13 साल में यह भारत का सबसे कम डेमोक्रेटिक स्कोर है 2014 में यह सबसे ज्यादा 7.92 था। डेमोक्रेटिक इण्डेक्स चुनावी प्रक्रिया और अनेकता की स्थिति, सरकार की कार्यप्रणाली, राजनीतिक भागीदारी, राजनैतिक संस्कृति और सामाजिक स्वतंत्रता जैसे पांच बिन्दुओं के आधार पर जारी की जाती है।

वैसे इस रिपोर्ट के मुताबिक इन सभी बिन्दुओं के आधार पर देखा जाए तो 2019 वर्ष भारत के लिए बेहद उथल-पुथल भरा रहा, भाजपा सरकार ने कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटा लिया, नागरिकता संशोधन कानून लागू किया। सरकार के इन ऐतिहासिक फैसलों ने राजनीतिक टकराव पैदा किया, नागरिकता संशोधन कानून को पूरे देश में भेदभाव भरे कानून के रूप में देखा गया। इन सबका असर 2019 में भारत में सामाजिक स्वतंत्रता और उसकी लोकतांत्रिक स्थिति पर पड़ा, जिसका परिणाम आज पूरे विश्व के सामने है।

अमेरिकी अखबार की यह रिपोर्ट यहीं तक सीमित नही रही, रिपोर्ट के मुताबिक भारत पिछले साल की तरह ही अपूर्ण लोकतंत्र के वर्ग में बना हुआ है, इस सूचकांक में 165 स्वतंत्र देशों और दो भूखण्डों को पांच श्रेणियों में सूचीबद्ध किया है और इन सूचियों में उल्लेखित देशों को पूर्ण, अपूर्ण और मिश्रित लोकतंत्र व तानाशाही शासन में बांटा गया है। इस रिपोर्ट में मीडिया की आजादी पर पाया गया है कि भारत में मीडिया अंशतः आजाद है। भारत में पत्रकारों को सरकार, सेना और वामपंथी समूहों से खतरा है, हिंसा के जोखिम ने भी मीडिया की कार्यशैली को प्रभावित किया है। रिपोर्ट के अनुसार स्वयं अमेरिका भी पूर्ण लोकतंत्र वाले वर्ग से बाहर है, अमेरिका का 21वां स्थान है, इसके अलावा जापान, इटली, फ्राँस, इजराईल, सिंगापुर और हांगकांग भी अपूर्ण लोकतंत्र वाले देशों की सूची में शामिल है। ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका पूर्ण लोकतंत्र वाले वर्ग से बाहर हो गया। इस सूची में शीर्ष स्थान प्राप्त करने वाले 19 देशों में ही पूर्ण लोकतंत्र बताया गया है, जिनमें नार्वे पहले, आईसलैण्ड दूसरे और स्वीडन तीसरे स्थान पर है। एक सौ दसवें स्थान पर पाकिस्तान को मिश्रित लोकतंत्र वाले वर्ग में रखा गया है।

यह तो हुई हमारी लोकतंत्रीय स्थिति की चर्चा अब यदि हम अन्य क्षेत्रों की बात करें तो विश्व बैंक के बाद अब अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी भारत के लिए चालू वित्त वर्ष विकास दर के अनुमान को घटा दिया है, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथन ने कहा है कि भारत सहित कई देशों में छाई आर्थिक सुस्ती का असर दुनियाभर में देखने को मिल रहा है। आईएमएफ के अनुमान के मुताबिक भारत की विकास दर चालू वित्त वर्ष में 4.8 फीसदी, वर्ष 2020 में 5.8 फीसदी और 2021 में 6.5 प्रतिशत रहने की संभावना है। आईएमएफ ने भारत की मौजूदा आर्थिक विकास दर के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए जल्द से जल्द कड़े कदम उठाने की भारत से अपेक्षा की है। आज भारत में स्थिति यह है कि निवेश प्रक्रिया धीमी होने के कारण नई नौकरियां पैदा नहीं हो पा रही है और पुरानी नौकरियों में वेतनवृद्धि पर अंकुश लग गया है, इससे उपभोग घट रहा है और हमारी अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ गई है।

अब डराने वाली तस्वीर यह है कि एक तरफ 16 लाख रोजगार घट गए है, वहीं महंगाई की स्थिति दिनोदिन भयावह होती जा रही है। एसबीआई की ताजा रिपोर्ट में भी बताया गया है कि आर्थिक सुस्ती का नौकरियों पर जबरदस्त असर पड़ा है, अनुमानित रूप से सरकारी नौकरियां भी 39 हजार तक कम होने की संभावना है। यह भी कहा गया कि 2016 के अंत में लागू नोटबंदी के कारण पचास लाख नौकरियां चली गई और उसके बाद से ही रोजगार के आंकड़ों में निरंतर रूप से गिरावट की रिपोर्ट आ रही है। जबकि 2014 के चुनावी घोषणा-पत्र में मौजूदा सत्तारूढ़ दल ने प्रतिवर्ष एक करोड़ युवाओं को नौकरियां या रोजगार मुहैय्या कराने का वादा किया था, उस हिसाब से अब तक के छः साल के शासनकाल में छः करोड़ युवाओं को नौकरियां या रोजगार मिल जाना चाहिए था, किंतु इसके दस प्रतिशत को रोजगार नहीं मिला, उल्टे लाखों बेरोजगार हो गए।

इस प्रकार कुल मिलाकर हर क्षेत्र में ही भारत को निरंतर गिरावट का सामना करना पड़ रहा है, अब इसका कारण क्या है? यह तो शौध का विषय है, किंतु सरकार को अब इस मामले में थोड़ा गंभीर होने की जरूरत है, वर्ना इस सरकार के शेष बचे चार साल के कार्यकाल में भी मौजूदा स्थिति चलती रही तो हमारा भारत हर क्षेत्र में अंतिम स्कोर पर पहुंच जाएगा और फिर इसे विश्व के अन्य उन्नत देशों की श्रेणी में लाना मुश्किल हो जाएगा।

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