संघ राष्ट्रवाद से दूरी क्यों बनाने लगा

Rss rastwad se duri banata

                                                                                                                                शिवेंद्र कुमार 'सुमन'
पिछले कुछ दशकों से सियासी हलकों में ‘राष्ट्रवाद’ शब्द को लेकर तूफान मचा हुआ है। वर्तमान प्रधानमंत्री खुले तौर पर खुद को ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ कहते रहे हैं। दूसरी ओर सत्ताधारी दल का मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) लगातार कहता आ रहा है कि हम ‘राष्ट्रवादी’ नहीं हैं। सचाई यह है कि राष्ट्रवाद हमारा (यानी हमारे देश का) शब्द ही नहीं है। पहले संघ अपने कार्यकर्ताओं को राष्ट्रवाद से बचने को कहता था, लेकिन अब संघ प्रमुख मोहन भागवत सार्वजनिक रूप से कहने लगे हैं कि भारत के आम लोगों को भी राष्ट्रवाद शब्द के प्रयोग से बचना चाहिए। इसकी जगह हमें राष्ट्र, राष्ट्रीय या फिर राष्ट्रीयता शब्द का प्रयोग करना चाहिए।बढ़ता हुआ दायरा
दरअसल केंद्र की सत्ता में पहुंचने और दुनिया भर में स्वीकृति पा लेने के बाद संघ अपनी छवि और सिद्धांतों को लेकर सचेत हो गया है। 

उसे अहसास है कि लोगों की उसमें दिलचस्पी बढ़ी है, उससे अपेक्षाएं बढ़ी हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में उसमें बदलाव की एक प्रक्रिया भी शुरू हुई है। इसके तहत ही उसकी वेशभूषा बदली और इसके नेतृत्व में अपने सिद्धांतों को ठीक से परिभाषित-प्रचारित करने की इच्छा दृढ़ हुई। पिछले साल दिल्ली में आयोजित नारद जयंती समारोह में संघ के सह सरकार्यवाहक मनमोहन वैद्य ने भी यही कहा था कि संघ राष्ट्रवाद में नहीं राष्ट्रीयता में विश्वास करता है। उन्होंने कहा कि भारत में राष्ट्रवाद कभी रहा ही नहीं। जिस राष्ट्रवाद की चर्चा देश में होती है, वह पश्चिमी देशों से आया है। इस धारणा का उद्गम भारत का है ही नहीं। पश्चिम में जिस नेशनलिज्म के नाम पर कई राज्यों ने अपने विस्तार के लिए दूसरे राष्ट्रों पर युद्ध थोपे, हिंसा और अत्याचार किए, वह वहीं पैदा हुआ और फला-फूला।

क्या हम राष्ट्रवाद की जगह किसी और शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकते? वैद्य ने एक प्रसंग सुनाया कि किस तरह कुछ पत्रकारों ने लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के बाद इसे विक्ट्री ऑफ नेशनलिज्म कहा। वैद्य ने कहा कि ‘मैं अगर संपादक होता तो इसे विक्ट्री ऑफ नेशनल एक्सप्रेशन कहता। हिंदी में इसे राष्ट्रवाद और आध्यात्मिकता की जीत की जगह राष्ट्रीयता और आध्यात्मिकता की विजय कहता। वैद्य के इस कथन से ही लग गया था कि राष्ट्रवाद पर संघ जल्द ही कोई औपचारिक स्टैंड ले सकता है। आखिरकार भागवत का बयान आ ही गया। वैसे, बताया यह भी जाता है कि तीन साल पहले ब्रिटेन में संघ का एक कार्यक्रम था, जिसमें मोहन भागवत का बौद्धिक भी शामिल था। कार्यक्रम से पहले पूरे यूरोप के कई विद्वान संघ प्रमुख से मिलने आए। सभी ने संघ प्रमुख को राष्ट्रवाद के ग्लोबल दुष्प्रभाव से वाकिफ कराया। उसके बाद संघ राष्ट्रवाद से दूरी बनाने को लेकर और गंभीर हो गया।

न्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के मुताबिक, ‘राष्ट्रवाद की विचारधारा इस तर्क पर आधारित है कि एक व्यक्ति का राष्ट्रवादी राज्य के प्रति समर्पण और वफादारी अन्य व्यक्तियों या सामूहिक हितों से कहीं ऊपर होता है।’ संघ के लिए चिंता का विषय यही है। भारत की राष्ट्रीयता सांस्कृतिक है। वह सिर्फ राजनीतिक नहीं है। जबकि पश्चिम का राष्ट्रवाद आक्रामक है। राजनीतिक और विस्तारवादी है। वह उस सोच का द्योतक है जो एक खास विचार पर चलती है और इस विचार को खास भू-भाग में रहने वाले लोगों पर जबरन थोपती है। संघ का मानना है कि भारतीय राष्ट्र का आधार उसकी संस्कृति है और भारतीय संस्कृति कभी भी साम्राज्यवादी और विस्तारवादी नहीं रही। संघ के अनुसार भारतीय संस्कृति के वाहक भारत के शासक नहीं, यहां के ऋषि-मुनि रहे। उन्हीं के सद‌्प्रयत्नों और तपश्चर्या से भारतीय संस्कृति का एक विराट ताना-बाना बुना गया। लेकिन राष्ट्रवाद शब्द संघ की इस पूरी सोच को ही कठघरे में खड़ा कर देता है।

वाद या इज्म की भारत में कोई विशेष ग्राह्यता कभी नहीं रही। स्वयं महात्मा गांधी ने भी कहा था कि ‘मेरी हार्दिक इच्छा है कि गांधीवाद शब्द का प्रचलन न हो (20 फरवरी 1940)।’ लेकिन, दुर्भाग्य यह है कि लोग आज भी गांधी के विचारों को गांधीवाद ही कहते हैं। यहां तक कि पाठ्यपुस्तकों में भी गांधी के दर्शन को गांधीवाद के रूप में पढ़ाया जाता है। एक और बड़ी चिंता जो संघ को परेशान करती है, वह है पश्चिम के जनमानस में राष्ट्रवाद की सोच। पश्चिमी देशों में राष्ट्रवाद को एक गाली के रूप में लिया जाता है। उसे मुसोलिनी और हिटलर की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। वहां राष्ट्रवाद का मतलब अपनी सोच को जबरन सब पर थोपे जाने से निकलता है। इस शब्द का प्रयोग करते ही लोगों के दिलोदिमाग में हिंसक छवि उभरकर सामने आ जाती है। यह भारतीय परंपरा से बिल्कुल अलग है। संघ नहीं चाहता है कि दुनिया में भारत की ऐसी छवि जाए। जैसे-जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दुनिया में स्वीकार्यता बढ़ रही है, वैसे-वैसे कुछ चीजों से संघ खुद को स्पष्ट रूप से अलग करना चाहता है। ऐसी चीजों में एक राष्ट्रवाद भी है, जो जाने-अनजाने समय के साथ संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों के साथ जुड़ गया था।

संघ की राय है कि भारत सनातन काल से एक राष्ट्र रहा है। इस पूरे भू-भाग की परंपराएं अलग-अलग नामों से लगभग एक जैसी रही हैं। इसमें कई राजनीतिक शक्तियां एक साथ काम कर सकती हैं, यानी सत्ता के कई केंद्र एक साथ रह सकते हैं। यही नहीं, कई विचार भी एक साथ रह सकते हैं। भारत की सनातनी परंपरा की यही पहचान है। संघ को लगता है कि राष्ट्रवाद शब्द के प्रयोग से दुनिया में हमें भी कट्टर समझा जाने लगेगा। दुनिया की नजरों में भारत की सहिष्णु छवि को यह शब्द नुकसान पहुंचाएगा। यह देखना वाकई दिलचस्प रहेगा कि संघ के साथ बीजेपी और दूसरे संगठन राष्ट्रवाद के संबोधन से खुद को किस तरह मुक्त कर पाते हैं और उनकी पहचान बन गए इस शब्द की जगह कौन सा शब्द लेता है।

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