कुछ दिया नहीं पर मोदी का कद बढ़ा गए ट्रंप

                                             
Did not give anything but Modi's stature increased
                                                                                     
                                                                                                                                            रंजीत कुमार
अमेरिकी राष्ट्रपतियों का भारत दौरा अक्सर एक उत्सव की तरह मनाया जाता है। आम जनता से लेकर मीडिया तक कई दिन पहले से दिन-रात अमेरिकी प्रेजिडेंट के दौरे की चर्चा में लगा रहता है। उनकी हर भाव-भंगिमा पर बारीक निगाह रखी जाती है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के 24-25 फरवरी के अहमदाबाद और नई दिल्ली दौरे की सूक्ष्म समीक्षा इस परंपरा का ही जारी रूप है। राष्ट्रपति ट्रंप को अहमदाबाद में जिस स्तर और व्यापकता के साथ जन सम्मान मिला उससे भी अधिक गर्मजोशी के साथ 1959 में अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर की अगवानी की गई थी। आइजनहावर शीतयुद्ध के उस दौर में आए थे, जब भारत अमेरिकी खेमे में नहीं माना जाता था और चीन के साथ खटपट शुरू हो गई थी। आइजनहावर की भी सड़कों के दोनों और खड़े होकर लाखों लोगों ने अगवानी की थी। उन्होंने रामलीला मैदान में प्रधानमंत्री नेहरू के साथ जनसभा को संबोधित किया था।

बदलता हुआ रुख

इसके बाद 1969 में रिचर्ड निक्सन, 1978 में जिमी कार्टर, 2000 में बिल क्लिंटन, 2006 में जार्ज डब्ल्यू बुश, 2010 और 2015 में बराक ओबामा ने भारत का दौरा कर दुनिया के सबसे बड़े जनतांत्रिक देश और दुनिया के सबसे पुराने जनतांत्रिक तंत्र के बीच रिश्तों की अहमियत बताई। निश्चय ही अमेरिकी राष्ट्रपतियों के भारत दौरों से विश्व राजनीतिक पटल पर भारत का कद ऊंचा हुआ है। इस बार ट्रंप भारत आए तो दुनिया का राजनीतिक समीकरण आइजनहावर के वक्त से काफी बदला हुआ है। भारत और अमेरिका के सामरिक रिश्तों को 21वीं सदी को पारिभाषित करने वाला रिश्ता बताया जाने लगा है। इसकी बढ़ती अहमियत को देखते हुए ही ट्रंप के भारत दौरे में इसका दर्जा विशेष सामरिक साझेदारी से बढ़ाकर समग्र वैश्विक सामरिक साझेदारी का किया गया। भारत के लिए इसके क्या मायने हैं, इसका पता भविष्य में भारत को लेकर अमेरिकी रुख को देखने के बाद ही लगेगा।

ट्रंप के ताजा दौरे के नतीजों की पृष्ठभूमि में देखा जाए तो पाकिस्तान और अफगानिस्तान को लेकर अमेरिका का बदला हुआ रुख भारत के लिए चिंता पैदा करने वाला ही कहा जा सकता है। सही मायने में भारत का अपने सामरिक साझेदार से यह अपेक्षा करना लाजिमी है कि वह पाकिस्तान को उसी तरह खरी-खोटी सुनाए, जिस तरह बिल क्लिंटन और जार्ज बुश के दौरे में पाकिस्तान को न केवल सख्त संदेश दिए गए बल्कि उसको आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाने के लिे भी मजबूर किया गया। निश्चय ही राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अकेले में और फिर शिष्टमंडल स्तर की बातचीत के बाद किसी नाटकीय समझौते या सहमति का ऐलान नहीं किया गया लेकिन इससे ट्रंप के भारत दौरे की अहमियत कम नहीं हो जाती।

बिल क्लिंटन के समय जनरल मुशर्रफ को आतंकवाद के मसले पर झुकने को मजबूर किया गया और जार्ज बुश ने भारत को दुनिया की परमाणु मुख्यधारा में शामिल होने का मौका दिलवाया। राष्ट्रपति ओबामा ने भी शुरुआती हिचक के बाद अफगानिस्तान और पाकिस्तान के मसले पर भारत का साथ दिया और रक्षा क्षेत्र में आपसी सहयोग को मजबूती प्रदान की। ट्रंप के शासन काल में अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर के मसले पर कड़ा रुख अपनाया और उसके खिलाफ प्रतिबंध लगवाने में सहयोग किया। लेकिन ट्रंप का बार-बार यह कहना कि वह भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने को तैयार हैं, भारत को खटकता रहता है। ताजा दौरे में तो उन्होंने जम्मू-कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच कांटे की संज्ञा दे दी और आतंकवाद को राज्य की नीति के तौर पर इस्तेमाल करने वाले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को अपने दोस्त की उसी श्रेणी में रखने की कोशिश की जिसमें वह प्रधानमंत्री मोदी को रखते हैं।

साफ है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जब अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बारे में भारत को खटकने वाला रुख अपनाते हैं तब शक होता है कि दोनों के बीच सामरिक साझेदारी की बातों में ईमानदारी और गंभीरता है या नहीं। लेकिन अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपतियों की तरह ट्रंप राजनीतिक राष्ट्रपति नहीं बल्कि व्यावसायिक पृष्ठभूमि वाले राष्ट्रपति के तौर पर जाने गए हैं, जिनका विश्वास शुद्ध रूप से लेन-देन में है। उनका भारत दौरा इसी पृष्ठभूमि में हुआ। वह भारत के सवा अरब उपभोक्ता बाजार का दोहन करने वाला और अमेरिका की अर्थव्यवस्था को चमकाने वाला व्यापार समझौता भारत के साथ करना चाहते थे, जो कि भारत का कोई भी नेता अपने राजनीतिक भविष्य की कीमत पर ही कर सकता था।

सामरिक धरातल पर अमेरिका अपनी नींव मजबूत करे, इसकी ट्रंप को उतनी चिंता नहीं है। वह अपने फैसले घरेलू स्तर पर अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के नजरिये से लेते रहे हैं। इस दौरे के पीछे भी अमेरिकी चुनावों में चालीस लाख की शक्ति वाले भारतीय समुदाय के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ाने की कोशिश है। निश्चय ही ट्रंप के भारत दौरे से न केवल उनका बल्कि प्रधानमंत्री मोदी का राजनीतिक कद भी ऊंचा हुआ है। बहरहाल, इन सब के बीच दोनों देशों के आला राजनयिकों ने कुछ गंभीर और ठोस काम भी किए हैं, जो भारत और अमेरिका को विश्व रंगमंच पर साझी भूमिका निभाने को प्रेरित करेंगे। इससे विश्व रंगमंच पर भारत की अहमियत बढ़ेगी।

चीन की पहेली

हिंद प्रशांत समुद्री इलाके में शांति-स्थिरता और कानून की व्यवस्था लागू करने में परस्पर साझेदारी बढ़ाने को लेकर दोनों देश प्रतिबद्ध हैं। लेकिन दोनों इस साझेदारी को किस तरह व्यावहारिक रूप देंगे, यह देखना होगा। यहां भारत को चीन की चुनौतियों का सामना करना है लेकिन चीन को पूरी तरह नाराज भी नहीं करना है। भारत के साथ सामरिक साझेदारी के रिश्तों को अमेरिका यह कह कर भी आगे बढ़ा रहा है कि वह चीन के मुकाबले भारत को सक्षम बनाना चाहता है, हालांकि इसी बहाने वह भारत को अपने हथियार बेचने की रणनीति पर भी अमल करता है।

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