गर्व करिए! आप 100 करोड़ हैं, फिर भी सहिष्णु हैं


हमारे देश में एक नेता हैं, जब देश में वंदे मातरम बोलने का विषय आता है, तो वह कहते हैं कि मेरी गर्दन पर तलवार रख दो, मैं फिर भी वंदे मातरम नहीं बोलूंगा। मातृभूमि के प्रति अपनी प्रेमाधारित आस्था को प्रदर्शित करने के लिए बोले जाने वाले उद्घोष का विरोध करने को लेकर वह तर्क देते हैं कि चूंकि संविधान में नहीं लिखा है, इसलिए वह वंदे मातरम नहीं बोलेंगे। उन्हीं नेताजी का एक और रूप है, जब देश में मुस्लिम महिलाओं के मानसिक और शारीरिक शोषण का सबसे सरल मार्ग बनते जा रहे ‘तीन तलाक’ को लेकर देश की सरकार एक कानून बनाती है तो वह उसी संविधान का हवाला देकर कहते हैं कि संविधान ने हमको मौलिक आधिकार के रूप में धर्म और उसकी मान्यताओं को मानने और उनका पालन करने की आजादी दी है, इसलिए हम ‘शरियत’ के खिलाफ नहीं जाएंगे। ठीक है

लेकिन बात सिर्फ यहीं नहीं खत्म होती। यह भाईसाहब वकील हैं! देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक व्यवस्था लाने की कोशिश होती है, यह साहब मुस्लिम समाज के रहनुमा हैं, लेकिन फिर भी देश को सबसे पहले मानने वाली परंपरा का निर्वाह करने वाले देश में रहते हैं, तो बड़े गर्व से मुसलमानों से कहते हैं कि मोदी-जैसे शाह विरोध करोगे तो ‘मर्द-ए-मुजाहिद’ कहलाओगे। वह कहते हैं कि कागज अगर दिखाने की बात होगी तो सीना दिखाएंगे कि मार गोली, मार दिल पे गोली मार क्योंकि दिल में भारत की मोहब्बत है। अरे साहब, यह तो बताओ कि क्या है यह मर्द-ए-मुजाहिद? ‘मजहब के लिए लड़ने वाला योद्धा’ ही ना? और आसान शब्दों में कहें तो जिहादी ही ना? उन्हें जिहाद का मतलब नहीं पता, उनके लिए तो बस जिहाद मोदी और शाह से लड़ना ही हो जाएगा ना? वैसे ही जैसे आतंकियों के लिए जिहाद बस ‘काफिरों’ की हत्या करना है, वैसे ही जैसे वे जिहाद के नाम पर वे निर्दोष मासूमों को मार डालते हैं।

और भई, मोदी और शाह का विरोध क्यों? देश की एक चुनी हुई सरकार, जिसपर देश ने अपना भरोसा जताया है, जिसे देश ने इस काम के लिए सत्ता सौंपी है कि वह राष्ट्रहित में फैसले ले सके। वह भारत की सरकार हमारे लिए यानी ‘भारत के लोगों के लिए’ कोई फैसला लेती है, तो उसपर भरोसा करना चाहिए ना। अपने सीने पर गोली खानी है तो यूं चंद कागजों के लिए क्यों खाने की बात कर रहे हो? मैं जानता हूं कि इस देश के मुसलमान के दिल में भारत ही है, लेकिन सर, कोई तो तरीका होगा ना जिससे कि उन लोगों का पता लगाया जा सके, जिनके दिल में ना भारत है और ना ही जो भारत की परंपरा में भरोसा करते हैं। ऐसे लोगों की प्राथमिक पहचान करने के लिए सरकार ने एक तरीका निकाला। राष्ट्र की सुरक्षा के लिए उसे स्वीकार करना चाहिए, या अगर ऐसे लोगों की पहचान का कोई और तरीका है तो उसे सरकार के समक्ष रखना चाहिए, लेकिन नहीं आपको तो वोट बैंक की राजनीति करनी है, आपको तो इस पूरे मामले को तिलक और दाढ़ी के बीच का ‘झगड़ा’ बनाना है। बनाइए, लेकिन याद रखिएगा ‘हम भारत के लोग’ आपके इस कुचक्र में बहुत समय तक फंसे नहीं रह सकते।

वे बात लोकतंत्र की करते हैं लेकिन फिर अचानक उनका एक ‘चिंटू’ उसी लोकतांत्रिक मर्यादा का के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश करते हुए कहता है कि हमें अपना ‘हक’ छीनकर लेना होगा। वह कहते हैं कि ‘हम’ 15 करोड़ हैं लेकिन एक सौ करोड़ पर भी भारी हैं। इससे पहले छोटे साहब ने कहा था ‘हमने’ 800 सालों तक भारत पर हुकूमत की है। थोड़ा और पहले छोटे साहब ने खुलेआम कहा था, ‘अरे हिन्दुस्तान, हम पच्चीस करोड़ हैं न .. तुम सौ करोड़ हो ना ..ठीक है .. 15 मिनट को पुलिस हटा लो बता देंगे किसमें हिम्मत है और कौन ताकतवर है।’ आप समझ रहे हैं इन बयानों में जो ‘हम’ का इस्तेमाल हो रहा है, वे कौन हैं? मुसलमान? नहीं! फिर कह रहा हूं, इस देश का असल मुसलमान तो हर रोज इसी मादर-ए-वतन की सरजमीं पर दिन में पांच बार नमाज पढ़ते वक्त जब अपना सिर झुकाता है तो उसका वंदे मातरम वहीं हो जाता है, उसके दिल में हिंदुस्तान है, वह अपना कागज तो दिखाएगा ही, साथ ही जरूरत पड़ने पर अपना सिर भी इसी मुल्क के लिए कटा लेगा। आजादी के लिए चल रहे आंदोलन से लेकर देश को परम् शक्तिशाली बनाने वालों में इस देश का मुसलमानों का भी शौर्य लगा है। ये ‘हम’ वे लोग हैं, जिन्हें मुगलों और भारतीय मुसलमानों का अंतर नहीं पता, ये वे जाहिल हैं जिन्हें इस बात के बारे में नहीं पता कि भारत 100 करोड़ लोगों का देश नहीं है, यह भारत तब बनता है, जब हर वह व्यक्ति जो इस देश में रहता है, इस देश को, इसकी परंपराओं को, इसकी मान्यताओं को अपना मानते हुए उसका सम्मान करता है, हर उस व्यक्ति के एक मुल्क के नाम पर ‘एक’ हो जाने से भारत बनता है।

कोई कुछ भी कहे, हमें पता है कि इन चंद जाहिलों के बयानों से देश नहीं टूटने वाला। हमने 17 बार गौरी को माफ किया, हमारे लाखों मंदिर तोड़े गए, जबरन हमारा धर्मान्तरण कराया गया, बंटवारे के बाद हम पाकिस्तान में काटे गए, फिर हमारी मां-बहनों की इज्जत लूटकर हमें कश्मीर में अपने ही घर से भगाया गया, हम बहुसंख्यक थे। शायद बाकियों से करीब पांच गुना ज्यादा, फिर भी हम कुछ नहीं बोले। हमारे आराध्य, इस देश की मर्यादा रूपी आस्था के सबसे बड़े प्रतीक श्रीराम सालों तक तंबू में बैठे रहे, हम फिर भी कुछ नहीं बोले। क्या लगता है? हम कमजोर थे? नहीं, हमें ‘भारत’ बनाए रखना था, हमें पता था कि दो-चार सत्ता के लालची लोगों के कुकृत्य को लेकिन एक वर्ग या समुदाय विशेष को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। हमें भरोसा था ईश्वर पर कि समय बदलेगा और फिर हमें हमारा ‘कश्मीर’ वापस मिलेगा, हमें भरोसा था देश के संविधान पर कि वह एक दिन हमें जरूर हमारे राम को भव्य भवन प्रदान करेगा। हमें भरोसा था खुद पर, हमें भरोसा था पड़ोस में रहने वाले उस ताहिर खान पर जिसके घर से सबसे पहले ईद पर सेवइयां मेरे घर पर आती हैं। आप तोड़ने की कोशिशें जारी रखिए, हम अपने इस भरोसे पर गर्व करते रहेंगे और ‘एक’ ही रहेंगे

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