कमाता है पर काम नहीं देता सोशल मीडिया

कमाता है पर काम नहीं देता सोशल मीडिया

                                                                                                                                     मुकुल श्रीवास्तव
बीता दशक सोशल मीडिया के लिए बेहद अहम रहा है। जब कभी सोशल मीडिया की बात की जाएगी, साल 2010 से शुरू होने वाले दशक को अलग से रेखांकित किया जाएगा। यही वह दौर था जब सोशल मीडिया फला-फूला और उसके राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों की चर्चा शुरू हुई। भारत इससे अछूता नहीं रहा, बल्कि वह इसकी धुरी ही बन गया। साल 2010 में जो सोशल मीडिया आशाओं का प्रतीक बन कर उभर रहा था, साल 2020 आते-आते वह फेक न्यूज और सामाजिक माहौल बिगाड़ने जैसे आरोपों से घिर गया। फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म के  चैतरफा प्रभावों पर काफी बहस हो चुकी है, पर इस दशक में इसके आर्थिक पक्ष पर बहुत कम बातचीत हुई है।

आंकड़ों का व्यवसाय

सोशल मीडिया की आंधी में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी नई तकनीक कुछ लोगों की नौकरियां मारती है तो रोजगार के काफी सारे नए अवसर भी पैदा करती है। इस कसौटी पर सोशल मीडिया को अभी तक नहीं कसा गया है। साल 2018 में फेसबुक ने 55 अरब डॉलर और गूगल ने 116 अरब डॉलर विज्ञापन से कमाए। मजेदार बात यह कि फेसबुक कोई भी उत्पाद नहीं बनाता। डेटा आज की सबसे बड़ी पूंजी है। यह डेटा का ही कमाल  है कि गूगल और फेसबुक जैसी अपेक्षाकृत नई कंपनियां दुनिया की बड़ी और लाभकारी कंपनियां बन गई हैं। डेटा ही वह ईंधन है जो अनगिनत संस्थानों को चलाए रखने के लिए जिम्मेदार है। तमाम तरह के ऐप्स और विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साइट्स उपभोक्ताओं के लिए बिल्कुल मुफ्त हैं। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिना किसी उत्पाद के भी सोशल मीडिया में रोजगार के कई सारे नए अवसर पैदा हुए होंगे। भारत में 46.20 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं जिसमें से करीब 25 करोड़ सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। सबसे ज्यादा इस्तेमाल फेसबुक और यू-ट्यूब का होता है।

आश्चर्य की बात है कि आज ‘नौकरी डॉट कॉम’ पर सोशल मीडिया से संबंधित केवल 19,057 नौकरियां  हैं। इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2018 के कारोबारी साल में फेसबुक इंडिया के मुनाफे में 40 प्रतिशत उछाल आया था जबकि 2019 के कारोबारी साल में यह मुनाफा बढ़ कर 84 फीसदी हो गया। यू-ट्यूब के भारत में 26.50 करोड़ एक्टिव यूजर्स हैं। लिंक्डइन के अपने यहां 5 करोड़ एक्टिव यूजर हैं। 2017 के कारोबारी साल से लिंक्डइन का मुनाफा 26 प्रतिशत बढ़ा है। भारत में हैलो, टिकटॉक और वीगो वीडियो की स्वामित्व वाली कंपनी बाइट डांस के करीब 25 करोड़ एक्टिव यूजर्स हैं। इस कंपनी ने कारोबारी साल 2019 में 3.4 करोड़ का मुनाफा कमाया। जैउबा कॉर्प के हिसाब से इस कंपनी के भारत में 10 से कम कर्मचारी हैं। लिंक्डइन के भारत में मात्र 750 कर्मचारी  हैं। साफ है कि सोशल मीडिया साइट्स में प्रत्यक्ष रोजगार बहुत ही कम हैं और इनकी ज्यादातर आमदनी यूजर सेंट्रिक  विज्ञापन से होती है। ज्यादातर साइट्स फ्री हैं इसलिए उपभोक्ता फ्री यूज की कीमत अपनी निजी जानकारी से चुकाते हैं।

असल में इंसान एक डेटा सेट (आंकड़े का पुलिंदा) में परिवर्तित हो गया और इससे मूल्यवान आज कोई चीज नहीं है। जो चीज हमें मुफ्त दिखाई दे रही है वह सुविधा हमें हमारे संवेदनशील निजी डेटा के बदले मिल रही है। कंपनियों की आमदनी का बड़ा हिस्सा विज्ञापनों से आता है और आप क्या विज्ञापन देखेंगे इसके लिए आपके व्यक्तित्व को जानना जरूरी है। यहीं से आंकड़े महत्वपूर्ण हो उठते हैं और इनको जुटाने में सोशल मीडिया साइट्स बड़ी भूमिका निभाती हैं। सोशल मीडिया पर आते ही  उपभोक्ता डेटा में तब्दील हो जाता है। फिर वह डेटा और ज्यादा डेटा पैदा करना शुरू कर दिया। इस तरह देश में हर सेकेंड असंख्य मात्रा में डेटा जेनरेट हो रहा है। आधिकारिक तौर पर सोशल मीडिया से भारत में  कितने रोजगार पैदा हुए इसका कहीं उल्लेख नहीं मिलता क्योंकि ये सारी कंपनियां इससे संबंधित आंकड़े सार्वजनिक रूप से नहीं जारी करतीं।

बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2019 में भारत में गूगल और फेसबुक ने 10,000 करोड़ रुपये कमाए। वहीं इकनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में रिलायंस इंडस्ट्रीज  ने 11,262 करोड़  रुपये कमाए। पर जब हम दोनों कंपनियों से मिले प्रत्यक्ष रोजगार और साथ ही उसके साथ बने इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को देखते हैं तो दोनों में जमीन-आसमान का अंतर मिलता है। इंफ्रास्ट्रक्चर और कंज्यूमर  गुड्स जैसे पारंपरिक उद्योग अपने रेवेन्यू के मुकाबले कहीं ज्यादा रोजगार देते हैं। जैसे 90 अरब डॉलर नेटवर्थ वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज 194,056 लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार देती है और इससे कहीं ज्यादा लोग वेंडर कंपनियों के माध्यम से रोजगार पाते हैं। टाटा स्टील अकेले ही 660,800 लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार देती हैं। यह आंकड़ा अपने आप काफी कुछ कह देता है। जाहिर है, आम हिंदुस्तानी के लिए सोशल मीडिया की उपयोगिता मनोरंजन के एक माध्यम जैसी ही है।

कैसे बंटे कमाई

ग्लोबल वेब इंडेक्स ‘सोशल मीडिया ट्रेंड’ की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर एक यूजर हर दिन लगभग ढाई घंटे सोशल नेटवर्क और मेसेजिंग में खर्च करता है। ट्रेंडिंग इकनॉमिक्स की एक स्टडी के मुताबिक भारत में एक  व्यक्ति 2020 में अनुमानतः 372 रुपये घंटा कमाएगा। इस हिसाब से सोशल मीडिया पर एक भारतीय व्यक्ति महीने में औसतन अगर अपने काम के नौ घंटे खर्च करता है तो इसके बजाय कोई और उत्पादक काम करते हुए वह महीने में न्यूनतम 3348 रुपये और साल में 40,176  रुपये कमा सकता है। जिस प्रकार मनोरंजन के पारंपरिक साधनों में कुछ रोजगार के अवसर पैदा होते हैं, वैसा ही सोशल मीडिया के साथ भी है पर इधर रोजगार बहुत ही कम हैं लिहाजा इसका लाभ कुछ सीमित  व्यक्तियों और संस्थाओं तक ही सीमित रहना तय है। उम्मीद करें कि नए दशक में सोशल मीडिया अपनी आय का एक हिस्सा उन तक भी पहुंचाएगा, जो अनजाने ही उसकी कमाई बढ़ाने में अपना समय और कौशल झोंक रहे हैं।

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