अयोध्या फैसले पर पुनर्विचार याचिका को लेकर बंटा मुस्लिम पक्ष

Muslim side divided over Ayodhya verdict

                                                                                                    अजय कुमार,लखनऊ
अपने आप को मुसलमानों का रहनुमा समझने का दंभ भरने वाला करीब 50 वर्ष पुराना ‘आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड’ (एआईएमपीएलबी) अपने आप को हमेशा सुर्खिंयों में बनाए रखने की कला में माहिर है। अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दाखिल करने की बात कह कर उसने यह बात फिर साबित कर दी है। इससे पहले भी कई मौकों पर बोर्ड सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मुखालफत कर चुका है। चाहें राजीव सरकार के समय मुस्लिम महिला साहबानों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गुजारा भता दिए जाने का फैसला रहा हो या फिर इंस्टेंट तीन तलाक को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, कट्टरपंथी सोच रखने वाले बोर्ड को कुछ भी रास नहीं आता है। वह हर मसले को शरीयत की चादर में छिपा देने को उतावला रहता है। समय के साथ बदल नहीं पाने और कट्टरपंथी सोच के चलते एआईएमपीएलबी से तमाम बुद्धिजीवी मुलसमान दूरी बनाने लगे हैं। आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड अपनी संकुचित सोच के चलते विवादों में भी बना रहता है। एक समय बोर्ड को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जेबी संगठन समझा जाता था। आज भी बोर्ड इसी लीक पर चलते हुए भाजपा और उसकी सरकारों की मुखालफत में लगा रहता है। बोर्ड का गठन जिन परिस्थितियों में हुआ था,उसे भी समझना जरूरी है।  

70 के दशक के शुरूआती समय यानी 1971 की बात है। जब देश की राजनीति तेजी से करवट ले रही थी। इंदिरा जी के लिए जहां एक तरफ जयप्रकाश जी के नेतृत्व में समाजवादियों की राजनीतिक चुनौती थी, वहीं वो कांग्रेस पार्टी के आतंरिक संकटों से भी जूझ रही थीं। इस दौरान न्यायपालिका से भी इंदिराजी के सम्बन्ध काफी तल्ख हो चुके थे। 1971 का लोकसभा चुनाव रायबरेली से हार जाने के बाद समाजवादी नेता राजनारायन ने इंदिराजी के खिलाफ मुकदमा ठोंक दिया था, जिसे वो 1975 जीते भी थे और तभी इमरजेंसी भी लागू की गयी थी।

इसी दौरान 1973 में इजरायल-अरब झगड़े में इजरायल को अमेरिकी मदद के खिलाफ सऊदी अरब के नेतृत्व में तेल-निर्यातक देशों के संगठन ओपेक द्वारा तेल उत्पादन और निर्यात पर कड़े नियंत्रण लगाने से भीषण तेल-संकट पैदा हो गया था। तेल के दामों में तीन डॉलर प्रति बैरल से 12 डॉलर प्रति बैरल तक की वृद्धि एकदम से हुई थी। दुनिया में तेल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी अमेरिकी खेमे में था। उस समय भारत के अमेरिका से रिश्ते अच्छे नहीं थे। इन हालातों में तेल के लिए पाकिस्तान-परस्त कट्टरवादी मुल्क सऊदी अरब और उसके करीबी मुल्कों से किसी भी तरह तेल खरीदने की इंदिरा साकार मजबूर थीं। अंतरराष्ट्रीय-राष्ट्रीय  कारणों से संकटग्रस्त इंदिरा सरकार आंतरिक अव्यवस्था और खराब अर्थव्यवस्था के कठिन दौर में थी।1973 आते-आते भीषण मंहगाई से त्रस्त जनता द्वारा समूचे उत्तर भारत में व्यापक जनआंदोलन शुरू हो चुके थे। तब सियासत के तहत चैतरफा संकटों से घिरी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा भारतीय मुस्लिम धार्मिक कट्टरपंथियों और उनके वैश्विक आका सऊदी अरब को प्रसन्न करने के लिए ही समाजसेवी संगठन एआईएमपीएलबी को इंदिरा सरकार की तरफ से इसके गठन और संरक्षण में पूरा योगदान दिया जाने लगा। इंदिरा आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के सहारे  नजदीक आ रहे अगले संसदीय चुनावों में समाजवादियों द्वारा खिसकाए जा रहे कांग्रेस के पुराने मुस्लिम वोट-बैंक के धर्मनेताओं को भी अपने पक्ष में साधना चाहती थी, और उन्होंने ऐसा किया भी।

आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड (AIMPLB) ने मुस्लिम महिलाओं के लिए तलाक के शरिया नियमों में किसी बदलाव का सदैव ही विरोध किया। 1978 में शाहबानों प्रकरण में मुस्लिम महिलाओं को गुजारा-भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को शरिया-विरोधी बताकर बोर्ड ने मानने से इनकार कर दिया। बाद में 1984 में बहुमत पाकर राजीव गाँधी की कांग्रेसी सरकार ने उलेमाओं और ।AIMPLB के दबाव में 1986 में संसद में कानून लाकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को शरिया के अनुकूल पलट दिया था। आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड सदैव से  बच्चों को अनिर्वाय और मुफ्त शिक्षा का भी हमेशा से विरोधी एकट 2009 का भी विरोधी रहा है। क्योंकि इसका मानना है कि मुस्लिम बच्चों को स्कूली शिक्षा अनिवार्य करने से उनकी मदरसा शिक्षा पर प्रभाव पड़ेगा। आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड बाल-विवाह का समर्थन करते हुए संविधान के बाल-विवाह निषेधक कानून का भी कड़ा विरोध करता है।

कहने को तो आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के गठन का उद्देश्य शरिया कानूनों को संरक्षित करना और उनके आड़े आ रही कानूनी बाधाओं को दूर करना ही था, लेकिन यह मुल्क के मुसलमानों के स्वैच्छिक धार्मिक-निर्देशक और नियंत्रक की तरह कार्य करता है। इसने बाबरी मस्जिद प्रकरण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तरह इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का भी पुरजोर विरोध किया था। बोर्ड द्वारा जयपुर साहित्य फेस्टिवल में सलमान रश्दी की वीडियो कांफ्रेंसिंग तक का इस्लाम पर खतरा बताकर कड़ा विरोध किया था। यही नहीं योग, सूर्य-नमस्कार, और वैदिक साहित्य-संस्कृति का भी यह कहते हुए विरोध किया कि यह सब इस्लाम-विरोधी ब्राह्मण-धर्म लागू करने का षड्यंत्र हैं। आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने तीन तलाक मामले पर सुप्रीम कोर्ट और मोदी सरकार के खिलाफ तलवारें निकाल ली  और तर्कहीन होने के कारण उसके द्वारा कहा जाने लगा कि तीन तलाक मामले को पेचीदा बनाने के लिए इसे यूनिफॉर्म सिविल कोड लाने की साजिश प्रचारित कर रही है।

यह सब बातें इसलिए बताई जा रही हैं जिससे बोर्ड का असली चेहरा समझा जा सके। अपने स्वभाव के अनुसार ही बोर्ड अयोध्या विवाद को सुलझने नहीं देना चाहता है। उसकी तरफ से बेबुनियाद तर्क दिए जा रहे हैं। इसी लिए  पिटीशन दाखिल करने को लेकर बोर्ड दो धड़ों में बंट गया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से साफ कर दिया गया है कि वह रिव्यू के लिए कोर्ट नहीं जाएगा। शिया वक्फ बोर्ड ने भी ऐसा ही कहा है। यहां तक की मुख्य पक्षकार इकबाल अंसारी भी सुप्रीम कोर्ट का फैसले के खिलाफ आगे नहीं जाना चाहते हैं।वहीं बोर्ड के अध्यक्ष धर्मगुरु मौलाना राबे हसनी नदवी चुप्पी साधे रहे। पर्सनल लॉ बोर्ड के भरोसेमंद सूत्रों ने बताया कि पूर्व सांसद मौलाना महमूद मदनी, पूर्व सांसद कमाल फारूकी, मौ. खालिद रशीद फरंगी महली सहित कई उलमा का कहना था कि पर्सनल लॉ बोर्ड को अपने पुराने स्टैण्ड पर कायम रहना चाहिए और रिव्यू पिटीशन दायर नहीं करना चाहिए। मौ. फरंगी महली का कहना था कि हमने जनता से खासकर मुसलमानें से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बिना शर्त मानने और उस पर अमल करने का वादा किया है। इस्लाम में वादा खिलाफी बड़ा गुनाह है। वहीं 5 एकड़ जमीन लेने का भी मामला उठा तो मौ. फरंगी महली का कहना था कि जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को दी गयी है। अगर बोर्ड इसको स्वीकार न करने की बात करेगा तो गलत मैसेज जाएगा। अगर सुन्नी वक्फ बोर्ड 26 नवम्बर को होने वाली अपनी बैठक में 5 एकड़ जमीन स्वीकार कर लेता है तो इसमें पर्सनल लॉ की बहुत फजीहत हो सकती है। 

रिव्यू पिटीशन के पक्ष में खड़े लोगों की बात की जाए तो इसमें  एआईएमआईएम सांसद असद उद्दीन ओवैसी, जफरयाब जीलानी और महासचिव मौ. वली रहमानी सरीखे पर्सनल लॉ बोर्ड के अलावा बोर्ड के कुछ सदस्य रिव्यू पिटीशन दाखिल करने के पक्ष में दिखे। ओवैसी ने कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं है। हमने विवादित जमीन के मालिकाना हक के लिए टाइटिल सूट दाखिल किया था। हम इसे निर्णय नहीं कह सकते। फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दाखिल करना हमारा संविधानिक अधिकार है। इसी तरह की बात जफरयाब जीलानी व मौ. रहमानी भी कर रहे हैं। 

रिव्यू पिटीशन दायर करने के फैसले के बाद आल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड पर वादाखिलाफी और अपने कमिटमेंट से मुकरने का इल्जाम लग रहा  है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट मामले का हल बातचीत से निकालने से लेकर फैसला आने के बाद तक पर्सनल लॉ बोर्ड के सभी पदाधिकारी देश के मुसलमानों से यह कह अपील कर रहे थे कि वह बिना शर्त सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानेंगे। बोर्ड का यह भी कहना था कि इस्लाम धर्म में सिर्फ मस्जिद की ही अहमियत नहीं है, बल्कि अपनी कही बात पर कायम रहने की भी बड़ी अहमियत है। लेकिन फैसला आने के बाद पर्सनल लॉ बोर्ड अपनी कही बात से साफ मुकर गया है। अपने आप को सही साबित करने के लिए उसके द्वारा शरीयत और सुप्रीम कोर्ट के फैसले दोनों की गलत व्याख्या की जा रही है। बोर्ड  फिर से उन्हीं बिन्दुओं को उठा रहा है, जिसे सुप्रीम कोर्ट में वह साबित नहीं कर पाया था। पर्सनल लाॅ बोर्ड इस बात को छिपा रहा है कि तमाम मुस्लिम देशों में विकास के काम में बाधा आने वाली मस्जिदों को हटा दिया जाता है। यहां तक की कुरान में मस्जिद को वैसी मान्यता नहीं मिली है जैसी मंदिर को हिन्दू धर्म में मिली हुई है। जहां तक बात विवादित ढांचा गिराए जाने की है तो उसके दोषियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चल रहा है। आडवाणी और कल्याण सिंह जैसे तमाम नेताओं को आरोपी बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट के आधार पर यह बात जरूर कही है कि इस बात के सबूत नहीं हैं कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी,लेकिन खुदाई में चीजें निकलीं वह यह साबित करने के लिए पर्याप्त थीं कि वहां मंदिर ही था। 

मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड भी यह बात समझता है,इसीलिए एक तरफ रिव्यू पिटीशन की बात की जा रही है तो दूसरी तरफ यह दावा भी किया जा रहा है कि उनकी पिटीशन सौ प्रतिशत खारिज हो जाएगी। लब्बोलुआब यह है कि हमेशा की तरह बोर्ड न्यायपालिका के फैसले पर प्रश्नचिन्ह लगाने की आदत से बाज नहीं आ रहा है। वह एक बार फिर झूठ की बुनियाद पर अपनी ‘इमारत’ मजबूत करने का सपना देख रहा है। यह सब वह किसके इशारे पर कर रहा है,इसे भी समझना जरूरी है। 

जस बेटा तस बाप 

आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल नाफ बोर्ड (एआइएमपीएलबी) के सदस्य व प्रतिबंधित स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट आफॅ इंडिया (सिमी) के पूर्व अध्यक्ष सैयद कासिम रसूल इलियास ने भी राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फेसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका की पैरोकारी की है। इनका बेटा उमर खालिद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में 2016 के देशद्रोह मामले में नामजद है। दोनों की भूमिका संदिग्ध होने के कारण पिता-पुत्र खुफिया एजेंसियों की निगरानी में है।

बाबरी मजिस्द समन्वय समिति में जमात-ए-इस्लामी हिंद के सदस्य 66 वर्षीय रसूल को एसक्यूआर नाम से भी जाना जाता है। वह आॅल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरात के महासचिव भी है। इनका जन्म महाराष्ट्रके अमरावती में हुआ, जहां से इन्होंने सिमी से राजनीति जीवन की शुरूवात की और बाद में इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। 2001 में आंतकी गतिविधियों में शामिल होने पर सिमी पर प्रतिबंध लगा।

मुस्लिम सियासत में इनकी बढ़ती हैसियत की ही मामला है पर्सनल लाॅ बोर्ड ने रविवार को प्रेस वार्ता में सुप्रीम कोर्ट के फेसले पर पुनर्विचार याचिका की जानकारी देने के लिए कासित रसूल को ही आगे किया। उधर, जेएनयू का पूर्व छात्र व उनका पुत्र उमर खालिद 2016 में उस समूह में शामिल था, जो आतंकी अफजल गुरू को फांसी देने के विरोध में प्रदर्शन कर रहा था।


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